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शमा

पिघल जाती है शमा खुद, बस एक लौ को जलाने मे। फिर भी थमती नही बेशुमारी परवाने की, जाने क्यों खुद को ..इसे बेइंतहा जलाने दे। है पिघलती पल-पल, निगलती वजूद को अपने जिस पल- हुए कौन जाने कुर्बां एक-दूजे को बनाने मे। पिघल जाती शमा ख़ुद कही, बस उस लौ को जलाने में। या ये लौ ही है जलती, इस वख्त की आजमाइश के आइने में। न कोई छू पाए, जो छू ले तो उसे जला जाए- बस अपनीे शमा को ही ये पिघलता छोड़ जाए। है फ़ना दोनो एक दूजे-को बनाने में, न वजूद किसी को एक-दूजे मिटाने दे। Neha
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